[संवाददाता, दीनू बघेल] नारायणपुर।छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की धरती पर आज भी लोक आस्था और परंपरा की जड़ें उतनी ही गहरी हैं, जितनी सदियों पहले थीं। इसी जीवंत परंपरा का साक्षी बना बस्तर संभाग का नारायणपुर जिला, जहां महिमागवाड़ी पंचायत के नयापारा में मां लक्ष्मी जगार का भव्य आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जनवरी-फरवरी माह के मध्य 9 दिवसीय लक्ष्मी जगार का आयोजन किया गया। आयोजन के दौरान पूरे पारा-मोहल्ले में धनकुल गीतों और जयकारों की गूंज सुनाई देती रही।
ग्रामीणों के अनुसार, यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, यह बस्तर की समृद्ध लोक संस्कृति को सहेजने का माध्यम भी है। बस्तर की पहचान बन चुके धनकुल गीत हल्बी भाषा में गाए जाते हैं। इन गीतों में धनुष से उत्पन्न विशेष ध्वनि के साथ मिट्टी की हंडी और पारंपरिक वाद्यों के जरिए देवी लक्ष्मी की आराधना की जाती है। इस परंपरा को निभाने वाले गायकों को हल्बी भाषा में ‘गुरुमाय’ कहा जाता है, जिसका अर्थ गुरु माता होता है। ग्रामीणों ने बताया कि बस्तर में कुल चार प्रकार के जगार होते हैं, जिनमें लक्ष्मी जगार का विशेष महत्व है। इस जगार की खास बात यह है कि इसमें पुरुष और महिलाएं दोनों समान रूप से भाग लेते हैं, और पूरी रात देवी की आराधना गीतों के माध्यम से की जाती है।
नयापारा में आयोजित लक्ष्मी जगार में महिला-पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल हुए, जिससे यह आयोजन एक सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील हो गया। गांव में दिन-रात श्रद्धा, भक्ति और लोकगीतों का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने बस्तर की लोक परंपराओं को जीवंत कर दिया।
आज जब आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं, ऐसे में नारायणपुर के नयापारा में आयोजित मां लक्ष्मी जगार यह संदेश देता है कि बस्तर आज भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है और उसकी सांस्कृतिक धरोहर आज भी पूरे गर्व के साथ सांस ले रही है।